एक हिन्दू ब्राह्मण परिवार का होकर भी मेरे मन में कभी ये खयाल नही आया की ऐसा क्यूँ है?
इस मस्ज़िद में इबादत के लिए आने वाले हर व्यक्ति से दुआ सलाम होता है
नतीजा वो शख्स शहर के किसी भी कोने में बाज़ारो में जब वापस नज़र आता तो एक तरह का अपनापन दर्शाता है किसी की भी नज़र में सम्प्रदाय को लेकर कुछ दूरी मुझे कंही भी नज़र नही आती
बस् मै भी इंसान होता हूँ और वो भी
फेसबुक देखते हुए जब कभी कुछ जोशीले लोगो को पढ़ता हूँ तो लगता है, काश ये जोश किसी और जगह लगता, कंही किसी सृजन की और प्रवाहित होता, क्या हम एक दूसरे को इंसान समझ ले बस् ये सम्भव नही है????
जब मेरे जैसा साधारण इंसान भी ये बात समझने को सकता है तो जो देश, प्रान्त, शहरों, और समाज के कर्णधार बने है उनको ये समझ नही आत????

किसी को लगता है हिन्दू खतरे में है
किसी को लगता है इस्लाम खतरे में है.
धर्म का चश्मा उतारो यारों हिन्दुस्तान खतरे में है.

अमा सोच बदलो समाज बदलेगा, देश बदलेगा. यह सब बैठे हुए फितूर लोगों की सोच है. जरा नज़र डालिए अपने चारों तरफ – कॉलेज में आपके कई दोस्त आपके धर्म से अलग होंगे उनके साथ चाय की चुस्कियां क्यों बढिया लगती है. ऑफीस में आपके कई सहकर्मी आपके लिए विधर्मी होंगे उनके साथ पार्टी और लंच में बुराई क्यों नहीं नज़र आती है? जब इन बातों को गलत नहीं समझते तो अपनी सोच को हमेश सही दिशा क्यों नहीं देते. जिसने भी गलत किया गुनहगार है मज़हब कोई भी हो. कोई मज़हब गलत तालीम नहीं देता बस हम हैं कि उसमें से अपने मतलब की बात निकाल लेते हैं. सच तो यह है दोस्तों कि आज न कोई पूरा हिन्दू है न कोई पूरा मुसलमान न कोई इंसान रह गया है.
हम पहले इंसान तो बनें
और जिस दिन हम इंसान बन गए, यकीन मानिये हम हिन्दू मुस्लिम रह ही नही पाएंगे
स्नेह ,सदभाव, हमारा पहली प्राथमिकता बन जायेगी

नमस्कार

–राजीव पुरोहित राज
मीरां नगरी मेड़ता सिटी

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