Full Name: Mohammad Sami “Rahbar Tabani”
Birthdate:
Father’s Name: Janab Hashim Ali
Birthplace: Daryabad, Uttar Pradesh, India
Occupation: Poet
Language: Urdu, Farsi
Literary Works: Aabley
Aabginey
Almaas
Harmeen
Shabe Charagh
Contact Number:  +91 9935790620

मोहम्मद समी उर्फ़ “रहबर ताबानी” साहब एक ग़रीब घराने में पैदा हुए। वालिद साहब लखनऊ में एक वर्कशॉप में मुलाजिम थे। सन १९५३ में मदरसा तालीमुल क़ुरान में दाखिला हुआ और १९५८ में दर्जा पंजुम पास किया इसके बाद हिफ्ज़े क़ुरान के लिए बिठा दिया गया। मगर मुसलसल दो साल की मेहनत के बाद हिम्मत जवाब दे गयी और पच्चीस सिपारे से आगे न बढ़  सके। इधर वालिद साहब १९५९ में मुलाज़मत से रिटायर हो गए। मुलाज़मत से रिटायर होने के बाद कुछ आमदनी का मुस्तक़िल ज़रिया न बन सका। जब हालात बहुत परेशानकुन हो गए तो सन १९६६ में इन्हें रोज़ी के लिए दरियाबाद छोड़के अहमदाबाद (गुजरात) की तरफ रवाना होना पड़ा।

कौन नहीं जनता कि अहमदाबाद गुजरात का वो तारीखी शहर है जिसकी बुनियाद तकरीबन छः सौ साल पहले अहमद शाह ने अपने मुक़द्दस हाथों से राखी थी। अहमदाबाद हमेशा इल्म व अदब व तह्ज़ीबो तमद्दुम का मरकज़ रहा है और अहमदाबाद ने बड़े बड़े आलिम और बड़े बड़े शायर पैदा किये। वहां आज भी कसरत से अदबी मुज़ाकिरे व मुशाएरे होते रहते हैं। वहां का अदबी माहौल रहबर साहब के लिए बड़ा साज़गार साबित हुआ। जल्दी ही रहबर साहब वहां के कमोबेश तमाम शायर से मुतारफ हो गए।

रहबर साहब को शाएरी का ज़ोक बचपन से ही था। अहमदाबाद की रिहाइश के दौरान हज़रत वहीद बनारसी से मुलाक़ात हुई। वह इनका ज़ोके सुखन देख कर इन पर बहुत ज्यादा मेहरबान हो गए और इन्होने उनकी शागिर्दी अख्तियार कर ली। मगर बदनसीबी देखिये की अभी इस्लाह लेते हुए कुछ ही अरसा गुज़रा था की अहमदाबाद में फिरकावाराना फसाद हो गया और वहीद साहब फ़सादियों के हाथों शहीद हो गए (इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलेही राजिउन)।

जनवरी १९७० में जब रहबर साहब दरियाबाद वापस आये तो जनाब क़दीर ताबानी साहब से मुलाक़ात हुई। क़दीर ताबानी साहब और रहबर साहब पहले से ही एक दोनों को अच्छी तरह जानते थे। मगर कोई शायराना रब्त ज़ब्त न था। ये मुलाक़ात मोसूफ़ से अदबी मुलाक़ात थी। उस वक़्त हज़रत ताबां शफ़ीकी साहब बाराबंकवी बाराबंकी को छोड़ के दरियाबाद में मुस्तक़िल रिहाईश अख्तियार कर चुके थे। क़दीर साहब इनको हज़रत ताबां शफ़ीकी की खिदमत में ले गए। इस तरह रहबर साहब को हज़रत ताबां शफ़ीकी साहब से शागिर्दी हासिल हुई। हज़रत ने बेहद खुशदिली से रहबर साहब की तरफ तवज्जो फरमाई और रहबर साहब ने वहीँ से अपना तखल्लुस “ताबानी” लिखना शुरू कर दिया।

रहबर साहब ने कई सारी किताबें लिख डाली हैं जिनमें से कुछ के नाम नीचे दिए हुए हैं:

  • आबले
  • आबगीने
  • अल्मास
  • हर्मीन
  • शबे चिराग़

खुमार बाराबंकवी की क़लम से;

रहबर जो खुद अज़ीम हो इज्ज़त मआब हो!
हम क्या उस आदमी का तअर्रुफ़ कराएँगे।।
इतना ज़रूर होगा कि हम उसके नाम से ।
दुनिया के गोशे गोशे में पहचाने जायेंगे ।।

रहबर साहब की एक ग़ज़ल,

ऐसे भी ज़िन्दगी में कई दौर आये हैं
हम रोते रोते मसलहतन मुस्कुराये हैं

जब भी सजाई हम ने ख्यालों की अंजुमन
उस ने ग़ज़ल के रूप में जलवे दिखाए हैं

तस्कीन हो सकी न उसे उम्र भर नसीब
एक बार जिस को देख के वह मुस्कुराये हैं

रहबर हुजूमे यास के चेहरे उतर गए
जिस वक़्त हम नसीबज़दा मुस्कुराये हैं

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